Sagar-:ज्ञान है सच्ची संपत्ति, निःस्वार्थ कर्म ही जीवन की सफलता का आधार- अविराज सिंह।The State Halchal News 

बांदरी-: ग्राम नेतना में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान युवा नेता अविराज सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि मनुष्य को बिना स्वार्थ और मोह के निरंतर अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म ही श्रेष्ठ है और निष्ठा के साथ किया गया परिश्रम भाग्य की रेखाओं को भी बदल देता है। उन्होंने कहा कि कई बार हम सोचते हैं कि यह हमारे भाग्य में नहीं है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है कि कर्म करते रहिए, फल की चिंता मत कीजिए। भाग्य स्वयं आपका साथ देगा।

अविराज सिंह ने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है, प्रभु भी उसका साथ देते हैं। उन्होंने कहा, कि धन की रक्षा हमें करनी पड़ती है, लेकिन ज्ञान ऐसी संपत्ति है जो स्वयं हमारी रक्षा करता है।" साथ ही उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा, "यदि सूर्य की तरह चमकना है तो सूर्य की तरह तपना भी पड़ेगा। बिना संघर्ष के जीवन में प्रगति संभव नहीं है।
अविराज सिंह ने कहा कि मनुष्य को बिना स्वार्थ और मोह के निरंतर अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म ही श्रेष्ठ है और निष्ठा के साथ किया गया परिश्रम भाग्य की रेखाओं को भी बदल देता है। उन्होंने कहा, "कई बार मनुष्य यह सोचकर निराश हो जाता है कि यह हमारे भाग्य में नहीं लिखा है, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण का संदेश स्पष्ट है - कर्म करते रहिए, फल की चिंता मत कीजिए। भाग्य स्वयं आपका साथ देगा।

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा, "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन - मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं। यह ग्रंथ केवल धार्मिक ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाता है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है, प्रभु भी उसका साथ देते हैं।
अविराज सिंह ने आगे कहा कि धन की रक्षा हमें करनी पड़ती है, लेकिन ज्ञान ऐसी संपत्ति है जो स्वयं हमारी रक्षा करता है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा, "यदि सूर्य की तरह चमकना है तो सूर्य की तरह तपना भी पड़ेगा। बिना संघर्ष के जीवन में प्रगति संभव नहीं है। ठहरा हुआ पानी और ठहरा हुआ जीवन दोनों ही खराब हो जाते हैं, इसलिए निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सतयुग में महीनों और वर्षों तक किए गए पूजा-पाठ से जो फल प्राप्त होता था, कलियुग में वही फल प्रभु की कथा सुनने मात्र से मिल जाता है। विशेष रूप से श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से मन में विनम्रता का भाव उत्पन्न होता है और अभिमान का अंत हो जाता है। जहां विनम्रता है, वहां विवेक हैय जहां विवेक है, वहां श्रीकृष्ण हैंय जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां धर्म है और जहां धर्म है, वहां विजय निश्चित है - "यतो धर्मः ततो जयः।"
उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए बताया  कि जब भगवान का साथ होता है तो धर्म की ही विजय होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने मानव जीवन के लिए अनेक संदेश दिए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख संदेश कर्म का है। मनुष्य को निरंतर अपना कर्तव्य निभाते रहना चाहिए।

अविराज सिंह ने वाणी, भोजन और विचारों पर संयम रखने का विशेष संदेश दिया । उन्होंने कहा  कि कठोर वाणी का घाव जीवन भर बना रहता है, जबकि मधुर वाणी से शत्रु भी मित्र बन सकता है। भोजन के संबंध में कहा गया कि "जीने के लिए खाएं, खाने के लिए न जिएं।" आवश्यकता से अधिक भोजन आलस्य को जन्म देता है और व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पाता। विचारों की शुद्धता को सच्ची पूजा बताया गया। उन्होने कहा कि पूजा केवल मंदिर जाने, आरती करने या जल चढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जब मन, वचन और कर्म शुद्ध हों, सभी के प्रति सम्मान का भाव हो और विशेष रूप से मातृशक्ति का आदर किया जाए, वही सच्ची पूजा है।  संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि संगति पारस मणि के समान होती है, जो लोहे को भी सोना बना देती है। यदि संगति अच्छी हो तो साधारण व्यक्ति भी महान बन सकता है।

कार्यक्रम में उन्होंने यह भी संदेश दिया गया कि प्रतिदिन प्रातः उठकर माता-पिता के चरण स्पर्श करने चाहिए, क्योंकि माता-पिता में तेतीस कोटि देवी-देवताओं का वास माना गया है। भगवान गणेश से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि दिन में एक बार माता-पिता की परिक्रमा कर ली जाए तो सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है।
ग्राम नेतना में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और कथा श्रवण का लाभ प्राप्त किया। व्यासपीठ पर विराजमान कथावाचक परमपूज्य पं. श्री ओमकार दुबे जी ने धर्म, कर्म, विनम्रता और संस्कारों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। यजमान श्री महेन्द्र सिंह लोधी जी सहित क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिक कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
समूचा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर धर्म, कर्म और संस्कारों के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और अंत में आभार व्यक्त किया गया।
संवाददाता - रामबाबू पटेल, जिला सागर (मध्यप्रदेश)



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